भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश के आदिवासी समाज के अनेक गुमनाम क्रांति वीरों में बस्तर(छत्तीसगढ़) के गुण्डाधूर का नाम सर्वोपरि हैं।इनका जन्म बस्तर के नेतानार नामक गाँव में हुआ था। गुण्डाधूर 1910 के आदिवासी विद्रोह के प्रमुख सूत्रधार थे।धुरवा जनजाति के माटी पुत्र, वीर गुण्डाधूर के नेतृत्व में बस्तर के देशभक्त आदिवासियों ने अंग्रेजी शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए शासकीय संस्थाओं,संपत्तियों को निशाना बनाया 1909- 10 में बस्तर में राजा रुद्र प्रताप देव, राज करते थे। अंग्रेज सरकार ने वहाँ बैजनाथ पण्डा नामक व्यक्ति को दीवान नियुक्त किया था, दीवान बैजनाथ पण्डा अंग्रेजों का चापलूस था, आदिवासियों का आर्थिक शोषण करता,अत्याचार भी करता था। बैजनाथ पंडा, बेतुके आदेशों से बस्तर के लोगों को परेशान करता था। अंग्रेजों के शोषण और दीवान की कुटिल नीतियों से बस्तर के लोग त्रस्त थे।बस्तर के लोगों की आजीविका, वन और वनोपज पर आधारित थी। वनोपज से ही वे जीवनयापन करते थे। वनों पर उनका एकाधिकार था, परंतु दीवान पंडा ने ऐसी नीति बनाई कि उनका अधिकार सीमित हो गया। वनवासी अपनी आवश्यकता की छोटी-छोटी वस्तु ओं के लिए भी तरसने लगे। जंगल से दातौन, पत्तियाँ तक तोड़ने के लिए सरकारी अनुमति लेनी पड़ती थी।बस्तर क्षेत्र में खोले जा रहे स्कूलों, पुलिस चौकियों के भवन निर्माण आदि के कार्यों में आदिवासियों से बेगार लिया जा रहा था।रियासत के अधिकारी और कर्मचारी आम जनता से दुर्व्यवहार करते थे,व्यापारी, सूदखोर और शराब ठेकेदार लोगों का शोषण करते थे राजा से मिलने भी नहीं दिया जाता था। दीवान पंडा की शह पर यह हो रहा था। जनता में असंतोष पनपने लगा। राज परिवार के लोगों में से राजा के चाचा लाल कालेन्द्र सिंह और राजा की सौतेली माँ सुवर्ण कुँवर जनता में बहुत लोकप्रिय थे। 1909 में बस्तर की जनता ने इनके साथ मिल कर इंद्रावती नदी तट पर एक विशाल सम्मेलन किया। हाथों में धनुष, बाण और फरसा लिये हजारों लोग इसमें शामिल हुए। सम्मेलन में सबने यह संकल्प लिया दीवान,अंग्रेजों के दमन व अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करेंगे। यहाँ सर्वसम्मति से उत्साही युवक गुण्डाधूर को नेता चुना गया। गुण्डाधूर पढ़ा-लिखा तो नहीं था, मगर उसमें नेतृत्व करने की क्षमता थी। गुण्डाधूर का असली नाम सोमारू था।1910 में जब बस्तर का संघर्ष हुआ,तब गुण्डाधूर की उम्र लगभग 35 वर्ष थी। गुण्डाधूर निडर, साहसी तथा सत्यवादी युवक था। आदिवासियों के स्वाभिमान,अधिकारों की रक्षा के लिए किसी से भी लड़ने का साहस उनमें था। गुण्डाधूर ने नेतृत्व संभा लते ही विद्रोह के कार्यक्रम की रुपरेखा बनाई। इस विद्रोह को स्थानीय बोली में ‘भूमकाल’कहा गया,इसका संदेश आम की टहनियों में मिर्च बाँधकर गाँव- गाँव में भेजा जाता था। स्थानीय लोग इसे ‘डारामिरी’ कहते और बड़े उत्साह से उसका स्वागत करते।यह गुण्डाधूर की अद्भुत संगठन क्षमता का ही परिणाम था कि अल्प समय में ही हजारों लोग ‘भूमकाल आंदोलन’ से जुड़ गए। गुण्डाधूर ने अंग्रेजों, व्यापारियों, सूदखोरों, सरकार के पिट्ठू अधिकारियों, कर्मचारियों को सबक सिखाने की रुप रेखा बनाई। उनकी योजना में अंग्रेजों के संचार साधनों को नष्ट करना, सड़कों पर बाधाएँ खड़ी करना, थानों एवं अन्य सरकारी कार्या लयों को लूटना और उनमें आग लगाना शामिल था।2 फरवरी 1910 को सबसे पहले बस्तर में ऐतिहासिक ‘भूमकाल’ की शुरुआत हुई। देखते ही देखते यह पूरे बस्तर में फैल गया। राजा ने इसकी सूचना अंग्रेजों को दी। अंग्रेज सरकार ने इस विद्रोह को कुचलने मेजर गेयर,डी बे्रट को 500 सशस्त्र सैनिकों के साथ बस्तर भेजा।गुण्डाधूर ने मूरतसिंह बख्शी, बाला प्रसाद नाजिर, वीर सिंह बंदार, रानी सुवर्ण कुँवर तथा लाल कालेन्द्र सिंह के सहयोग से विद्रोह का कुशलता पूर्वक संचालन किया। आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेज सैनिकों का इन वनवासियोंने डण्डा,भाला, तीर तलवार और फरसा से जम कर मुकाबला किया। जगह -जगह मुठभेड़ हुई। सैकड़ों क्रांतिकारी,अंग्रेज सैनिक मारे गए। मई 1910 तक यह विद्रोह अंग्रेजों द्वारा क्रूरतापूर्वक कुचल दिया गया। इतिहासकार डॉ. रामकुमार बेहार के अनु सार- ‘‘सन् 1910 का बस्तर विद्रोह संघर्ष के क्षेत्र और गहनता दोनों ही दृष्टियों से व्यापक था। उत्तर से दक्षिण 136और पूर्व से पश्चिम 95 किलोमीटर का बस्तर, इस उथल- पुथल से प्रभावित था। गाँव-गाँव में आम की टहनी, लाल मिर्च, एक तीर घुमाए गए थे। इसका मतलब लड़ाई के लिए एकत्र होना था ,यही उनका सांकेतिक संदेश था।’’गुण्डाधूर ने पुनः अपने सहयोगियों को एकत्रित कर अलनार में अंग्रेजों से मुकाबला किया। एक सोनू माँझी, लालची व्यक्ति के विश्वासघात करने पर उनके कई साथी मारे, पकड़े गए। पकडे़ गए लोगों को बाद में फाँसी दे दी गई। गुण्डाधूर किसी तरह से बच निकले। अंग्रेजों ने बस्तर का चप्पा -चप्पा छान मारा, लेकिन अंत तक गुण्डाधूर का पता नहीं लगा सके। अंग्रेजों ने उसे जीवित या मृत पकड़ने वाले को पुरस्कृत करने की घोषणा भी की परन्तु अंत तक वे पकड़े नहीं जा सके।भूमकाल आंदोलन यद्यपि असफल हो गया पर गुण्डाधूर आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत कर दिया। उनके भीतर अपनी मिट्टी, अपने जंगल और देश के प्रति प्रेम का भाव जगा। असफलता के बावजूद गुण्डाधूर के नेतृत्व में किया गया यह विद्रोह आदिवासियों को अनेक सुविधाएँ दिलाने वाला ही साबित हुआ। वनों का आर क्षण कम किया गया।बेगारी पर कुछ हद तक रोकलगी।गुण्डाधूर को बस्तर का स्वाभिमान कहा जाता है। जनश्रुतियों तथा गीतों में उनकी वीरता का वर्णन मिलता है....आओ सब मिलकर गाएं
गाथा गुंडाधुर की....
धीर था, वह वीर था,
बस्तर का शमशीर था।