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: एक पत्थर पर टिकी हुई है बहादुर कलारिन की माची.

Admin Sun, Jul 14, 2024

  माची का अर्थ होता है... लम्बी,लम्बी लकड़ियों, खंभों मंचों आदि की वह रचना जिसके आधार पर कोई भारी चीज रखी जाती है। बहादुर कलारिन की माची यह करीबन 600- 700 वर्ष पुराना स्मारक है। बालोद से लगभग 25 किमी की दूरी पर बालोद -पुरुर रोड पर चिरचिरी गांव में(अब जिला बालोद) छत्तीसगढ़ में स्थित है। बात उन दिनों की है जब ब्यापार के रूप में मदिरा दुकान का संचालन कलावती कर रही थी। गाँव से हटकर पत्थरीले चट्टान की ओर पत्थर की माची बनाकर कलावती मदिरा का काम करती थी मदिरा व्यवसाय के साथ- साथ कलावती ने इत्र और औषधि के अर्क तैयार करने का काम शुरू किया था,इस कारोबार में उसने अपार धन संपदा भी एकत्र किया था,कमर में कटार बाँध कर सोने की बैठकी में कलावती महारानी के समान ही दिखती थी उससे शराब खरीदने के लिए दूर-दूर से “कलार“ व्यापारी आते थे। शांत,सादगीपूर्ण व्यवहार के आगे सभी नतमस्तक थे, कभी-कभार मनचलों का सामना भी कलावती से होता था लेकिन उन्हें मुँह की खानी पड़ती थी और वे शर्मसार होकर भाग खड़े होते थे। कलावती के इस पराक्रम ने ही उसे बहादुर कलारिन बना दिया था। प्रचलित गाथा के अनुसार एक हैयवंशी राजा शिकार खेलने वहां आए। वे बहादुर कलारिन नामक युवती से मिले और उसके सौंदर्य पर मुग्ध होकर उसके साथ गंधर्व विवाह कर लिया,वह गर्भवती हुई,उसने शिशु को जन्म दिया, जिसका नाम कछान्या रख दिया। युवा होने पर उसने मां से अपने पिता का नाम पूछा और मां के द्वारा नाम बताने पर वह सभी राजाओं से घृणा करने लगा। उसने एक सैन्य दल गठित किया,समीपस्थ कुछ राजाओं को पराजित कर उनकी कन्याओं को बंदी बना अपने घर ले आया। बंदिनी राजकुमारियों को अन्न कूटने, पीसने के काम में लगा दिया।कुछ से दुर्व्यवहार भी करने लगा था! बहादुर कलारिन ने अपने पुत्र को समझाया भी कि किसी एक से शादी करके अन्य राजकुमारियों को छोड़ दे, किंतु उसने मां की आज्ञा नहीं मानी। बेटे के कृत्यों से तंग आकर ही बहादुर कलारिन ने भोजन में जहर मिला कर अपने पुत्र को मार डाला और कुंए में कूदकर प्राण त्याग दिये। नारी सम्मान और त्याग की याद में मंदिरावशेष, मण्डप को बहादुर कलारिन की माची कहा जाता है।बहादुर कलारिन,सिन्हा समाज की आराध्य देवी हैं। छग में बहादुर कलारिन की गाथा शौर्य और साहस का पाठ पढ़ाती है। आज विभिन्न मंचों के माध्यम से इस वीरांगना के साहस त्याग की अभिव्यक्ति भी जन मानस में होने लगी है।

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