: "देवगढ़ की पहाड़ियों के बीच सैकड़ो वर्ष पुराना चांगदेवी का ऊर्जा मंदिर"
Admin Sun, Jul 7, 2024
धर्म अध्यात्म एवं आराधना स्थल के प्रति श्रद्धा भारतीय संस्कृति की अपनी पहचान रही है फिर चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़ा व्यक्ति हो. अपने धर्म के आराधना स्थल पर पहुंचकर एक शांति महसूस करता है मंदिर मस्जिद चर्च या गुरुद्वारा में पहुंचकर व्यक्ति अपने आप में परिवर्तन महसूस करता है. मंदिर गुरुद्वारा एवं चर्च ऐसे स्थान होते हैं जहां हम अपने गुनाहों को भी ईश्वरीय आस्था के सामने रख देते हैं और यदि हमें गुनाह के मार्ग को छोड़ना है तब इस आराधना स्थल से श्रेष्ठ स्थल और कोई नहीं हो सकता. यहाँ हम एक ऐसी शक्ति के सामने अपने गलतियों की क्षमा मांगते हैं जहां कोई गवाह नहीं होता लेकिन इस असीम शक्ति के समक्ष दिया गया वचन व्यक्ति स्वयं नहीं तोड़ सकता क्योंकि यह वचन स्वयं से स्वयं को परिवर्तित करने के लिए दिया गया वचन होता है. ईश्वरीय आस्था के आराधना स्थल स्वयं को बदलने या असफलता को सफलता में बदलने की आंतरिक शक्ति हमारे भीतर पैदा करते हैं.
हिंदू धर्म का इतिहास जितना पुराना है उतना ही पुराना अध्यात्म एवं चिंतन के केंद्र मंदिरों का इतिहास भी है . मंदिरों के ऐतिहासिक पन्नों में लगभग 7000 से 10000 वर्ष पुरानी मंदिरों की भी जानकारी मिलती है जो सतयुग और त्रेतायुग के प्राचीनता के मतभेद को लेकर बदलती है. प्राचीन हिंदू मंदिरों का निर्माण एवं स्थापना पर गंभीरता से अध्ययन करने पर पता चलता है कि प्राचीन काल में मंदिर खगोलीय स्थान को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे. ताकि ग्रहो का प्रभाव मंदिर पर भी दिखाई दे. हालांकि वैदिक काल में ऋषि मुनियों द्वारा प्रकृति एवं शांत वातावरण में जंगलों के बीच अपने आश्रम में ध्यान प्रार्थना चिंतन एवं यज्ञ करने की जानकारी मिलती है. उस समय मंदिर का महत्व इतना ज्यादा नहीं था फिर भी ग्रामीण अपने गांव एवं स्थान विशेष पर भगवान शिव, माता गौरी एवं अन्य देवी देवताओं की पूजा किया करते थे. रामायण एवं महाभारत कालीन समय में भी गौरी पूजन एवं कृष्ण के साथ पांडव द्वारा माता गौरी से मंदिर में जाकर युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए आशीर्वाद लेने की जानकारी मिलती है.
प्राचीन काल में मंदिर ज्योतिष वास्तु एवं धर्म के नियमों के अनुसार बनाए जाते थे जहां पहुंचने वाले भक्त एक विशेष ऊर्जा से संचारित होते थे क्योंकि इन मंदिरों में ज्योतिष और वास्तु के साथ-साथ नक्षत्रों के परिगमन पथ का भी विशेष ध्यान रखा जाता था जिससे यह मंदिर ऊर्जा संरक्षण के केंद्र बन गए हैं. अपने घर गांव के पास बने मंदिर में भी आंतरिक ऊर्जा का संचरण होता है क्योंकि यह हमारी आस्था से जुड़ा होता है और आस्था के साथ जुड़ा हुआ हमारा मन हमें सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है इसलिए मंदिर स्थल पर हमें शांति एवं अदृश्य शक्ति की आभा का आभास होता है.
शांति एवं सद्मार्ग की अदृश्य शक्ति का पुंज बिखेरती छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़( एमसीबी )जिले के जनकपुर विकासखंड के भरतपुर ग्राम में चांग माता का मंदिर विराजमान है. जो जनकपुर अर्थात चांगभखार स्टेट के राजाओं के महामाया देवी के रूप में स्थापित है. कुछ विद्वा आध्यात्मिक आस्था के केंद्र के रुप मे चर्चित इस मंदिर की प्राचीनता के बारे में जानकारी लेने पर पता चलता है कि तत्कालीन राजा बालेंद के पड़ाव स्थल "कोरापाठ" में चांग देवी के मंदिर की प्रारंभिक स्थापना की गई थी. वर्तमान भरतपुर में स्थापित चांग देवी का मंदिर उसी की भाव प्रतिभा है जो मां महामाया की ऊर्जा से प्रकाशित है. ऐसी मानता है कि वनवासी भगवान श्री राम का सबसे पहले छत्तीसगढ़ प्रवेश बनास नदी के तट पर स्थित सीतामढ़ी हरचौका में हुआ था जहाँउन्होंने शिवलिंग की स्थापना कर शिव की आराधना की थी. इसी सीतामढ़ी हरचौका से लगभग 3 किलोमीटर आगे घने जंगलों के बीच पहाड़ी पर राजा बालेंद के पड़ाव स्थल "कोरापाठ" की स्थिति की जानकारी मिलती है. ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार लगभग 350 वर्ष पूर्व राजा बालेंद्र का यहां पर राज्य था . जो इस मंदिर की प्राचीनता की कहानी कहता है. स्थानीय निवासी भैया बहादुर सिंह के अनुसार किवदंतियों में यह भी कहा जाता है कि राजा बालेंद के पूर्व झगरू नाम का सिद्ध साधक इस महामाया देवी की पूजा अर्चना किया करता था. माता की अनन्य भक्ति और सिद्धि से उसने एक खाड़ा (तलवार का एक प्रकार) खंजर प्राप्त कर लिया था. कहते हैं कि जब तक यह खाड़ा उसके पास था उसे कोई हरा नहीं सकता था लेकिन बालेंद्र राजा ने धोखे से उसका खाड़ा हासिल कर लिया और वही उसके मृत्यु का कारण बना, उसके पश्चात मंदिर के देखरेख का कार्य राजा बालेंद और उनके सहयोगियों द्वारा किया जाने लगा. जैसे को तैसा की उक्ति को चरितार्थ करते हुए राजा बालेंन्द को कोल राजाओं और धारमल शाही द्वारा हराकर यह राज्य हथिया लिया गया. ब्रिटिश काल में चांगभखार अलग स्टेट बना दिया गया. और यहां स्थापित महामाया देवी मंदिर का यह मंदिर अंचल की मान्यता प्राप्त चांग देवी का मंदिर कहा जाने लगा.
भक्तगणों की आस्था एवं विश्वास में कहा जाता है कि यहाँ महामाया स्वरूप चांग देवी के मंदिर में महामाया के जीभ की पूजा होती है क्योंकि बिलासपुर के रतनपुर की महामाया मंदिर में उनके सिर की पूजा अंबिकापुर में धड़ की पूजा एवं इसी तरह चांग देवी मंदिर में जीभ की पूजा होती है लेकिन दूसरे पक्ष में शास्त्र प्रमाण में ज्वाला जी के मंदिर में जीभ की पूजा की जानकारी वर्णित है अतः इसकी सत्यता विश्वसनीय नहीं है. इसी प्रकार दुर्गा सप्तशती में मां महामाया का अलग स्वरूप एवं पूजा विधान वर्णित है. कुछ विद्वानों के मत अनुसार चांग देवी मंदिर की मूर्ति कलचुरी काल (छठवीं शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी तक) की शिल्पकला की मूर्ति है जो इसे रतनपुर महामाया देवी से जोड़ती है क्योंकि रतनपुर की महामाया कलचुरी काल में स्थापित की गई थी देश की 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ के होने की इसकी मान्यता है. इस मंदिर को कौशलेश्वरी देवी के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि वर्तमान छत्तीसगढ़ दक्षिण कोशल का ही हिस्सा था . माता सती के अलग अलग हिस्सों को शक्ति पीठ कहा गया है किन्तु इसे महामाया देवी मन्दिर कहा जाता है और चांगदेवी इसी मंदिर का अंश होने के कारण इसे भी महामाया की मान्यता दी जाती है. इस मंदिर की स्थापना के संबंध में एक और मान्यता के अनुसार कंवर जाति के कुछ लोगों द्वारा जब मूर्ति यहां लाई जा रही थी तब भरतपुर आते - आते रात हो गई और माता की मूर्ति यहां रख दी गई. बाद में मूर्ति को यही ऊंची नीची देवगढ़ की पहाड़ियों के मध्य स्थापित करने की चेतना ने यही स्थित भरतपुर मे चांग देवी का मंदिर बना दिया गया. जिसे समय के अंतराल मे भव्यता प्रदान की गई. स्थानीय भाषा में ऊंची नीची पहाड़ियों को भखार कहा जाता है इसलिए इस राज्य का नाम चांगभखार रखा गया.
मंदिरों के नामकरण को लेकर चाहे जितनी भी किवदंतियां प्रचलित हो , लेकिन किसी भी मंदिर के परिसर में शांति और विशेष ऊर्जा का आभामंडल हमेशा विद्यमान रहता है. इसी आध्यात्मिक ऊर्जा एवं आभामंडल से समृद्ध इस चांगदेवी के मंदिर में भी विशेष ऊर्जा का आभामंडल हमें महसूस होता है. सोनहत की पहाड़ियों से गुजरने वाले कर्क रेखा का आशिक प्रभाव भी इस मंदिर पर दिखाई पड़ता है,यही कारण है कि यह मंदिर आज एक सिद्ध स्थल के रूप में अपनी पहचान बन चुका है. जिसकी परिधि में हम स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार करते हैं, स्वयं को पहचानने की कोशिश करते हैं. अपने सुख-दुख ,सफलता - असफलता को असीम ऊर्जा से सम्पन्न शक्ति स्वरूपा देवी के साथ बाँटते हैं और अपनी आत्मिक ऊर्जा को माता का आशीर्वाद मानकर जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग ढूढ़ते हैं. अध्यात्म और ईश्वरीय शक्ति की यही किरणें जहाँ हमारा मार्ग प्रशस्त करती हैं वहीं जंगली जानवरों को भी आकर्षित करता है. इस मंदिर परिसर मे दिन की आरती के बाद एक भालू माता का दर्शन करने एवं नारियल का प्रसाद ग्रहण करने रोज यहाँ आता है. इस दौरान किसी को कोइ हानि नहीं पहुचाता है. इस मंदिर के परिसर में एक सैकड़ो वर्ष पुराना बरगद का पेड़ इसकी प्राचीनता की कहानी कहता था किंतु वर्तमान में बरगद के पेड़ के गिर जाने से मंदिर परिसर की आभामंडल में कुछ कमी महसूस होती है. इसी बरगद की पेड़ों से निकलने वाले नए पौधे आगे बढ़कर इस आभामंडल को और विस्तार देंगे, ऐसा विश्वास है.
सैकड़ो वर्ष पुराने चांग देवी के इस मंदिर तक पहुंचाने के लिए आपको छत्तीसगढ़ के रायपुर एवं बिलासपुर शहर पहुंचना होगा. जहां से आपको छत्तीसगढ़ के नवीन 32 वें जिले एमसीबी के मनेन्द्रगढ़ मुख्यालय पहुंचना होगा. मनेन्द्रगढ़ मुख्यालय से लगभग 110 किलोमीटर की यात्रा जनकपुर जाने के लिए करनी पड़ती है जो राष्ट्रीय राजमार्ग 43 से मनेन्द्रगढ़ - अम्बिकापुर मार्ग से प्रारंभ होती है और आगे 9 किलोमीटर कठौतिया से बायें उत्तर दिशा में मुड़कर आगे स्टेट हाईवे क्रमांक 6 से जनकपुर तक की लगभग 100 किलोमीटर की आगे यात्रा करनी होगी. जनकपुर पहुँचकर स्टेट हाईवे क्रमांक 3 जनकपुर- कोटाडोल से आगे की यात्रा प्रारंभ होती है और आगे 7 किलोमीटर की दूरी पर चांग देवी का यह विशेष आभा स्रोत से भरा मंदिर स्थापित है. इस मंदिर के परिसर की लगभग 7 एकड़ की भूमि का यह देवालय परिसर चांग देवी का देवालय क्षेत्र कहलाता है. मुख्य सड़क से ही चांग देवी का ध्वज आपका स्वागत करता है. मंदिर प्रांगण में पहुँचते ही सकारात्मक ऊर्जा का संचरण आपको आत्मिक शांति प्रदान करता है. यहाँ कुछ देर बैठकर माता का आशीर्वाद लेकर हम आगे के देव स्थलों का भी भ्रमण कर सकते हैं. भगवान श्रीराम के वनवास काल के यादोँ से जुडे़ इस तपस्वी भूमि की पवित्र माटी मे उनके कई अवशेष व्याप्त है.जिसका दर्शन भी आप इस यात्रा के साथ कर सकते हैं. इसी मार्ग से आगे जनकपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर घाघरा सीतामढ़ी का मंदिर है, जहा ऋपियों के साथ भगवान श्री राम ने अपना चौमासा बिताया था .ऋषि मुनियों के साथ आश्रम में रहते हुए यही से उन्होंने राक्षसों का वध किया था. यह मार्ग आगे कमर्जी मुरकिल होते हुए बनास नदी को पार कर सिंगरौली जिले के रेणुकूट तक पहुंच जाती है, हालांकि अभी यह मार्ग पूरी तरह बन नहीं पाया है लेकिन बड़े चक्के अर्थात एस यू वी गाड़ियों में रेनू कोट से भी सीधे यहां पहुंचा जा सकता है.
कैमूर एवं देवगढ़ की पहाड़ियों के बीच पनपते सघन जंगलों की जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) के वनों में विविध प्रजातियों की वनस्पतियों एवं पेड़ों की श्रृंखला मिलती है. इन्हीं वनों के बीच पशु पक्षियों के कलरव के मधुर गान का आनंद इस मार्ग में आपको मिलता है मनेन्द्रगढ़ से बस टैक्सी या अपनी गाड़ी से आप मनेन्द्रगढ़- जनकपुर की यात्रा के लिए निकल सकते हैं.यहाँ रुकने के लिए वन विभाग के साथ साथ शासकीय विश्राम गृह तथा कुछ छोटे लाज उपलब्ध हैं किन्तु मनेन्द्रगढ़ रुकने हेतु उचित स्थान है जहाँ मध्यम एवं अच्छे होटल तथा भोजन की व्यवस्था उपलब्ध हैं.
परिवार एवं बच्चों की खुशियों एवं आस्था एवं सांस्कृतिक विरासत का पाठ देने वाले भगवान राम के अवशेषों से जोड़ने वाले इस ऐतिहासिक यात्रा के मध्य (मनेनद्रगढ़ से 50 किलोमीटर दूर ) चुटकी गांव में (उपका पानी (अर्थात जमीन की सतह से निकलने वाले पानी की धार) और जंगली पशु बंदर ,भालू, सियार, लकड़बग्घा जैसे जंगली पशु पक्षियों से भी आपकी रास्ते में मुलाकात होती रहेगी.जो आपके बच्चों का मनोरंजन करते रहेंगे.
आध्यात्मिक ध्यान चिंतन एवं आस्था के साथ शांति एवं ऊर्जा की आभा से परिपूर्ण चांग देवी के मंदिर में एक बार पहुंचकर माता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें. यह यात्रा आपके जीवन के यादगार पलों मे शामिल रहेगी. यहाँ दोपहर में भोजन प्रसाद की व्यवस्था भी यहां के पुजारी सूर्यमणि जी से फोन नंबर 8839654327 पर संपर्क करके सहयोग एवं श्रद्धा राशि के भुगतान के साथ प्राप्त की जा सकती है. माता के सामने अपनी सफलता असफलता एवं जीवन के उतार चढ़ाव को व्यक्त करने और उनसे अपनी आंतरिक आत्मिक शांति के लिए कुछ मांगने का एक अच्छा अवसर साबित होगा, ऐसा हमारा मानना है. इस आराधना स्थल की नई ऊर्जा और आशीर्वाद से आपको जीवन के लिए नया मार्ग मिलेगा यह हमारा विश्वास है.
बस इतना ही फिर मिलेंगे
किसी नए पर्यटन स्थल पर--
हिंदू धर्म का इतिहास जितना पुराना है उतना ही पुराना अध्यात्म एवं चिंतन के केंद्र मंदिरों का इतिहास भी है . मंदिरों के ऐतिहासिक पन्नों में लगभग 7000 से 10000 वर्ष पुरानी मंदिरों की भी जानकारी मिलती है जो सतयुग और त्रेतायुग के प्राचीनता के मतभेद को लेकर बदलती है. प्राचीन हिंदू मंदिरों का निर्माण एवं स्थापना पर गंभीरता से अध्ययन करने पर पता चलता है कि प्राचीन काल में मंदिर खगोलीय स्थान को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे. ताकि ग्रहो का प्रभाव मंदिर पर भी दिखाई दे. हालांकि वैदिक काल में ऋषि मुनियों द्वारा प्रकृति एवं शांत वातावरण में जंगलों के बीच अपने आश्रम में ध्यान प्रार्थना चिंतन एवं यज्ञ करने की जानकारी मिलती है. उस समय मंदिर का महत्व इतना ज्यादा नहीं था फिर भी ग्रामीण अपने गांव एवं स्थान विशेष पर भगवान शिव, माता गौरी एवं अन्य देवी देवताओं की पूजा किया करते थे. रामायण एवं महाभारत कालीन समय में भी गौरी पूजन एवं कृष्ण के साथ पांडव द्वारा माता गौरी से मंदिर में जाकर युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए आशीर्वाद लेने की जानकारी मिलती है.
प्राचीन काल में मंदिर ज्योतिष वास्तु एवं धर्म के नियमों के अनुसार बनाए जाते थे जहां पहुंचने वाले भक्त एक विशेष ऊर्जा से संचारित होते थे क्योंकि इन मंदिरों में ज्योतिष और वास्तु के साथ-साथ नक्षत्रों के परिगमन पथ का भी विशेष ध्यान रखा जाता था जिससे यह मंदिर ऊर्जा संरक्षण के केंद्र बन गए हैं. अपने घर गांव के पास बने मंदिर में भी आंतरिक ऊर्जा का संचरण होता है क्योंकि यह हमारी आस्था से जुड़ा होता है और आस्था के साथ जुड़ा हुआ हमारा मन हमें सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है इसलिए मंदिर स्थल पर हमें शांति एवं अदृश्य शक्ति की आभा का आभास होता है.
शांति एवं सद्मार्ग की अदृश्य शक्ति का पुंज बिखेरती छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़( एमसीबी )जिले के जनकपुर विकासखंड के भरतपुर ग्राम में चांग माता का मंदिर विराजमान है. जो जनकपुर अर्थात चांगभखार स्टेट के राजाओं के महामाया देवी के रूप में स्थापित है. कुछ विद्वा आध्यात्मिक आस्था के केंद्र के रुप मे चर्चित इस मंदिर की प्राचीनता के बारे में जानकारी लेने पर पता चलता है कि तत्कालीन राजा बालेंद के पड़ाव स्थल "कोरापाठ" में चांग देवी के मंदिर की प्रारंभिक स्थापना की गई थी. वर्तमान भरतपुर में स्थापित चांग देवी का मंदिर उसी की भाव प्रतिभा है जो मां महामाया की ऊर्जा से प्रकाशित है. ऐसी मानता है कि वनवासी भगवान श्री राम का सबसे पहले छत्तीसगढ़ प्रवेश बनास नदी के तट पर स्थित सीतामढ़ी हरचौका में हुआ था जहाँउन्होंने शिवलिंग की स्थापना कर शिव की आराधना की थी. इसी सीतामढ़ी हरचौका से लगभग 3 किलोमीटर आगे घने जंगलों के बीच पहाड़ी पर राजा बालेंद के पड़ाव स्थल "कोरापाठ" की स्थिति की जानकारी मिलती है. ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार लगभग 350 वर्ष पूर्व राजा बालेंद्र का यहां पर राज्य था . जो इस मंदिर की प्राचीनता की कहानी कहता है. स्थानीय निवासी भैया बहादुर सिंह के अनुसार किवदंतियों में यह भी कहा जाता है कि राजा बालेंद के पूर्व झगरू नाम का सिद्ध साधक इस महामाया देवी की पूजा अर्चना किया करता था. माता की अनन्य भक्ति और सिद्धि से उसने एक खाड़ा (तलवार का एक प्रकार) खंजर प्राप्त कर लिया था. कहते हैं कि जब तक यह खाड़ा उसके पास था उसे कोई हरा नहीं सकता था लेकिन बालेंद्र राजा ने धोखे से उसका खाड़ा हासिल कर लिया और वही उसके मृत्यु का कारण बना, उसके पश्चात मंदिर के देखरेख का कार्य राजा बालेंद और उनके सहयोगियों द्वारा किया जाने लगा. जैसे को तैसा की उक्ति को चरितार्थ करते हुए राजा बालेंन्द को कोल राजाओं और धारमल शाही द्वारा हराकर यह राज्य हथिया लिया गया. ब्रिटिश काल में चांगभखार अलग स्टेट बना दिया गया. और यहां स्थापित महामाया देवी मंदिर का यह मंदिर अंचल की मान्यता प्राप्त चांग देवी का मंदिर कहा जाने लगा.
भक्तगणों की आस्था एवं विश्वास में कहा जाता है कि यहाँ महामाया स्वरूप चांग देवी के मंदिर में महामाया के जीभ की पूजा होती है क्योंकि बिलासपुर के रतनपुर की महामाया मंदिर में उनके सिर की पूजा अंबिकापुर में धड़ की पूजा एवं इसी तरह चांग देवी मंदिर में जीभ की पूजा होती है लेकिन दूसरे पक्ष में शास्त्र प्रमाण में ज्वाला जी के मंदिर में जीभ की पूजा की जानकारी वर्णित है अतः इसकी सत्यता विश्वसनीय नहीं है. इसी प्रकार दुर्गा सप्तशती में मां महामाया का अलग स्वरूप एवं पूजा विधान वर्णित है. कुछ विद्वानों के मत अनुसार चांग देवी मंदिर की मूर्ति कलचुरी काल (छठवीं शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी तक) की शिल्पकला की मूर्ति है जो इसे रतनपुर महामाया देवी से जोड़ती है क्योंकि रतनपुर की महामाया कलचुरी काल में स्थापित की गई थी देश की 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ के होने की इसकी मान्यता है. इस मंदिर को कौशलेश्वरी देवी के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि वर्तमान छत्तीसगढ़ दक्षिण कोशल का ही हिस्सा था . माता सती के अलग अलग हिस्सों को शक्ति पीठ कहा गया है किन्तु इसे महामाया देवी मन्दिर कहा जाता है और चांगदेवी इसी मंदिर का अंश होने के कारण इसे भी महामाया की मान्यता दी जाती है. इस मंदिर की स्थापना के संबंध में एक और मान्यता के अनुसार कंवर जाति के कुछ लोगों द्वारा जब मूर्ति यहां लाई जा रही थी तब भरतपुर आते - आते रात हो गई और माता की मूर्ति यहां रख दी गई. बाद में मूर्ति को यही ऊंची नीची देवगढ़ की पहाड़ियों के मध्य स्थापित करने की चेतना ने यही स्थित भरतपुर मे चांग देवी का मंदिर बना दिया गया. जिसे समय के अंतराल मे भव्यता प्रदान की गई. स्थानीय भाषा में ऊंची नीची पहाड़ियों को भखार कहा जाता है इसलिए इस राज्य का नाम चांगभखार रखा गया.
मंदिरों के नामकरण को लेकर चाहे जितनी भी किवदंतियां प्रचलित हो , लेकिन किसी भी मंदिर के परिसर में शांति और विशेष ऊर्जा का आभामंडल हमेशा विद्यमान रहता है. इसी आध्यात्मिक ऊर्जा एवं आभामंडल से समृद्ध इस चांगदेवी के मंदिर में भी विशेष ऊर्जा का आभामंडल हमें महसूस होता है. सोनहत की पहाड़ियों से गुजरने वाले कर्क रेखा का आशिक प्रभाव भी इस मंदिर पर दिखाई पड़ता है,यही कारण है कि यह मंदिर आज एक सिद्ध स्थल के रूप में अपनी पहचान बन चुका है. जिसकी परिधि में हम स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार करते हैं, स्वयं को पहचानने की कोशिश करते हैं. अपने सुख-दुख ,सफलता - असफलता को असीम ऊर्जा से सम्पन्न शक्ति स्वरूपा देवी के साथ बाँटते हैं और अपनी आत्मिक ऊर्जा को माता का आशीर्वाद मानकर जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग ढूढ़ते हैं. अध्यात्म और ईश्वरीय शक्ति की यही किरणें जहाँ हमारा मार्ग प्रशस्त करती हैं वहीं जंगली जानवरों को भी आकर्षित करता है. इस मंदिर परिसर मे दिन की आरती के बाद एक भालू माता का दर्शन करने एवं नारियल का प्रसाद ग्रहण करने रोज यहाँ आता है. इस दौरान किसी को कोइ हानि नहीं पहुचाता है. इस मंदिर के परिसर में एक सैकड़ो वर्ष पुराना बरगद का पेड़ इसकी प्राचीनता की कहानी कहता था किंतु वर्तमान में बरगद के पेड़ के गिर जाने से मंदिर परिसर की आभामंडल में कुछ कमी महसूस होती है. इसी बरगद की पेड़ों से निकलने वाले नए पौधे आगे बढ़कर इस आभामंडल को और विस्तार देंगे, ऐसा विश्वास है.
सैकड़ो वर्ष पुराने चांग देवी के इस मंदिर तक पहुंचाने के लिए आपको छत्तीसगढ़ के रायपुर एवं बिलासपुर शहर पहुंचना होगा. जहां से आपको छत्तीसगढ़ के नवीन 32 वें जिले एमसीबी के मनेन्द्रगढ़ मुख्यालय पहुंचना होगा. मनेन्द्रगढ़ मुख्यालय से लगभग 110 किलोमीटर की यात्रा जनकपुर जाने के लिए करनी पड़ती है जो राष्ट्रीय राजमार्ग 43 से मनेन्द्रगढ़ - अम्बिकापुर मार्ग से प्रारंभ होती है और आगे 9 किलोमीटर कठौतिया से बायें उत्तर दिशा में मुड़कर आगे स्टेट हाईवे क्रमांक 6 से जनकपुर तक की लगभग 100 किलोमीटर की आगे यात्रा करनी होगी. जनकपुर पहुँचकर स्टेट हाईवे क्रमांक 3 जनकपुर- कोटाडोल से आगे की यात्रा प्रारंभ होती है और आगे 7 किलोमीटर की दूरी पर चांग देवी का यह विशेष आभा स्रोत से भरा मंदिर स्थापित है. इस मंदिर के परिसर की लगभग 7 एकड़ की भूमि का यह देवालय परिसर चांग देवी का देवालय क्षेत्र कहलाता है. मुख्य सड़क से ही चांग देवी का ध्वज आपका स्वागत करता है. मंदिर प्रांगण में पहुँचते ही सकारात्मक ऊर्जा का संचरण आपको आत्मिक शांति प्रदान करता है. यहाँ कुछ देर बैठकर माता का आशीर्वाद लेकर हम आगे के देव स्थलों का भी भ्रमण कर सकते हैं. भगवान श्रीराम के वनवास काल के यादोँ से जुडे़ इस तपस्वी भूमि की पवित्र माटी मे उनके कई अवशेष व्याप्त है.जिसका दर्शन भी आप इस यात्रा के साथ कर सकते हैं. इसी मार्ग से आगे जनकपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर घाघरा सीतामढ़ी का मंदिर है, जहा ऋपियों के साथ भगवान श्री राम ने अपना चौमासा बिताया था .ऋषि मुनियों के साथ आश्रम में रहते हुए यही से उन्होंने राक्षसों का वध किया था. यह मार्ग आगे कमर्जी मुरकिल होते हुए बनास नदी को पार कर सिंगरौली जिले के रेणुकूट तक पहुंच जाती है, हालांकि अभी यह मार्ग पूरी तरह बन नहीं पाया है लेकिन बड़े चक्के अर्थात एस यू वी गाड़ियों में रेनू कोट से भी सीधे यहां पहुंचा जा सकता है.
कैमूर एवं देवगढ़ की पहाड़ियों के बीच पनपते सघन जंगलों की जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) के वनों में विविध प्रजातियों की वनस्पतियों एवं पेड़ों की श्रृंखला मिलती है. इन्हीं वनों के बीच पशु पक्षियों के कलरव के मधुर गान का आनंद इस मार्ग में आपको मिलता है मनेन्द्रगढ़ से बस टैक्सी या अपनी गाड़ी से आप मनेन्द्रगढ़- जनकपुर की यात्रा के लिए निकल सकते हैं.यहाँ रुकने के लिए वन विभाग के साथ साथ शासकीय विश्राम गृह तथा कुछ छोटे लाज उपलब्ध हैं किन्तु मनेन्द्रगढ़ रुकने हेतु उचित स्थान है जहाँ मध्यम एवं अच्छे होटल तथा भोजन की व्यवस्था उपलब्ध हैं.
परिवार एवं बच्चों की खुशियों एवं आस्था एवं सांस्कृतिक विरासत का पाठ देने वाले भगवान राम के अवशेषों से जोड़ने वाले इस ऐतिहासिक यात्रा के मध्य (मनेनद्रगढ़ से 50 किलोमीटर दूर ) चुटकी गांव में (उपका पानी (अर्थात जमीन की सतह से निकलने वाले पानी की धार) और जंगली पशु बंदर ,भालू, सियार, लकड़बग्घा जैसे जंगली पशु पक्षियों से भी आपकी रास्ते में मुलाकात होती रहेगी.जो आपके बच्चों का मनोरंजन करते रहेंगे.
आध्यात्मिक ध्यान चिंतन एवं आस्था के साथ शांति एवं ऊर्जा की आभा से परिपूर्ण चांग देवी के मंदिर में एक बार पहुंचकर माता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें. यह यात्रा आपके जीवन के यादगार पलों मे शामिल रहेगी. यहाँ दोपहर में भोजन प्रसाद की व्यवस्था भी यहां के पुजारी सूर्यमणि जी से फोन नंबर 8839654327 पर संपर्क करके सहयोग एवं श्रद्धा राशि के भुगतान के साथ प्राप्त की जा सकती है. माता के सामने अपनी सफलता असफलता एवं जीवन के उतार चढ़ाव को व्यक्त करने और उनसे अपनी आंतरिक आत्मिक शांति के लिए कुछ मांगने का एक अच्छा अवसर साबित होगा, ऐसा हमारा मानना है. इस आराधना स्थल की नई ऊर्जा और आशीर्वाद से आपको जीवन के लिए नया मार्ग मिलेगा यह हमारा विश्वास है.
बस इतना ही फिर मिलेंगे
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