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: रायपुर में 500 वर्षों से अधिक पुराना जगन्नाथ मंदिर और वर्षो से निकाली जाती है 'रथयात्रा

Admin Sun, Jul 7, 2024

आज ही के दिन करीब 56-57 साल पहले हम माता-पिता, भाई, बहनों के साथ रायपुर आये थे....

…..….........…........................................................ रायपुर की सबसे 'पुरानी बसाहत पुरानी बस्ती' टूरी हटरी में 500 साल से भी अधिक पुराना जगन्नाथ मंदिर है, कहा जाता है कि पहले इसे साहूकार का मंदिर के नाम से जाना जाता था, चर्चा है कि इस मंदिर का निर्माण किसी अग्रवाल परिवार ने कराया था,खैर वर्तमान में इस मंदिर का संचालन दूधा धारी मठ ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। यहाँ कई वर्षो से रथयात्रा निकाली जाती है। जगन्नाथ मंदिर पुरी की तर्ज पर यहां भी जेष्ठ पूर्णिमा पर भगवान को स्नान कराने, बीमार पड़ने के बाद पंचमी, नवमी, एकादशी पर काढ़ा पिलाने की रस्म निभाई जाती है।छग के रायपुर स्थित पुरानी बस्ती स्थित टुरी हटरी से निकलने वाली रथयात्रा में शामिल होने,भगवान के रथ को खींचने राजधानी के आस पास से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। रथ खींचने का मौका मिले तो श्रद्धालु स्वयं को भाग्य शाली समझते हैं,भीड़ के कारण मौका न मिले तो भी रथ की रस्सी को मात्र छूने का अवसर ढू़ंढते रहते हैं, इसी प्रयास में रथ जहां से गुजरता है, वहां तक जाने से भी लोग पीछे नहीं हटते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान के रथ को खींचने से पाप व कष्ट दूर होते हैं, पुण्यफल की प्राप्ति होती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर विराजते हैं।आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से रथयात्रा का आयोजन होता हैं।जगन्नाथ,बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ की अर्ध निर्मित मूर्तियां रथ पर रखी जाती हैं। स्कंद पुराण में स्पष्ट कहा है कि रथयात्रा में जो जगन्नाथ का कीर्तन करता हुआ नगर भ्रमण करता है, रथ को स्पर्श करने मात्र से ही सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। दूसरी ऐसी मान्यता है कि जो भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचता है उसे फिर जन्म नहीं लेना पड़ता है यानी इसी जन्म में मुक्ति मिल जाती है,मान्यता यह भी है कि जगन्नाथ स्वयं रथ पर सवार जनता का हाल जानने के लिए निकलते है। टूरी हटरी,रायपुर से वर्षो से रथ यात्रा निकाली जाती है।नगर भ्रमण में घर से स्वागत में पुष्प अर्पित कर महाप्रसाद, भोग लगाया जाता है। यह बात अजीब जरूर लगती है लेकिन यह सच है कि जगन्‍नाथ,बहन सुभद्रा,बड़े भाई बलराम तीनों की मूर्तियों में किसी के हाथ,पैर और पंजे नहीं होते हैं। इसके पीछे एक पौराणिक कथा यह है कि प्राचीनकाल में इन मूर्तियों का निर्माण विश्‍वकर्मा कर रहे थे। उनकी यह शर्त थी कि जब तक मूर्तियों को बनाने का काम पूरा नहीं हो जाएगा तब तक उनके कक्ष में कोई प्रवेश नहीं करेगा। लेकिन राजा ने कक्ष का दरवाजा खोल दिया तो विश्‍वकर्मा ने मूर्तियों को बनाना बीच में ही छोड़ दिया। तब से मूर्तियां अधूरी रह गईं जो कि आज तक पूरी नहीं हो पाई हैं। मूर्तियों को नीम की लकड़ी या चंदन की लकड़ी से बनाया जाता है। रायपुर में जगन्नाथ की रथयात्रा, नगर भ्रमण होने के बाद मौसी के घर टिल्लू चौक में रखी जाती हैं और वहाँ से फिर उनकी मंदिर में वापसी होती है।वैसे अवंति विहार, सदर बाजार,आमापारा, शास्त्री बाजार बांसटॉल, लिली चौक व गुढ़ियारी स्थित जगन्नाथ मंदिरों से भी रथयात्रा निकलकर राजधानी के मुख्य मार्गो का भ्रमण करती हैं।

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