: माँ महामाया और रतनपुर का चारों युगों में अस्तित्व रहा है
Admin Wed, Jul 31, 2024
बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित माँ महामाया मंदिर का छग के इतिहास और संस्कृति में बड़ा महत्व है। पौराणिक नगरी रतनपुर दक्षिण कोसल की राजधानी रही है। ऐसा माना जाता है कि इस नगरी का अस्तित्व चारों युगोँ में रहा है। मान्यता है किअंबिकापुर स्थित महामाया मंदिर में महामाया देवी का शरीर स्थित है।शीश बिलासपुर के रतनपुर के महा माया मंदिर में है।
डॉ.गोविन्द प्रसाद शर्मा ने लिखा है :
" मैं हरिश्चंद्र की लीला भू का,
सुविदित "मणिपुर" ग्राम अहो !
त्रेता में द्विगुणित गुणा-पण से,
प्रमुदित "मणिकपुर" नाम सखे !
द्वापर में हरी उर माल बीच, “हीरापुर "भी अधिमान हुआ !
अब भी जो रत्न उगलता , मैं वही “रत्नपुर” ग्राम सखे !
सतयुग में इसका नाम “मणिपुर” था,त्रेता में“माणिकपुर”, द्वापर में “हीरापुर” और वर्तमान में “रतनपुर”। पौराणिक कथा के अनुसार इसका उल्लेख सतयुग में आता है।दुर्गा सप्तशती और मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख मिलता है।देश के 51 शक्ति पीठ में शामिल रतनपुर की मां महामाया देवी मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक है। महामाया मंदिर में माता सती का स्कंध गिरा था, इसलिये इस स्थल को शक्तिपीठ में शामिल किया गया।
इतिहास-मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में कराया गया था।1045 ईस्वी में राजा रत्नदेव प्रथम, मणि पुर नामक गांव में शिकार के बाद एक वटवृक्ष के नीचे रात्रि विश्राम किया।आधी रात में जब आंख खुली तब उन्होंने वटवृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश देखा। वे चमत्कृत हो गए। वहांआदि शक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई थी। यह देख कर राजा अपनी चेतना खो बैठे। सुबह होने पर वे राज धानी तुम्मानखोल लौट गये और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया।1050 ईस्वी में रतन पुर में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया। मंदिर के भीतर महाकाली महासरस्वती, महालक्ष्मी की कलात्मक प्रतिमाएं विराज मान हैं। पौराणिक ग्रंथ महाभारत व जैमिनी पुराण में रतनपुर को राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। इसे चर्तुयुगी नगरी भी कहा जाता है,जिसका तात्पर्य है कि इसका अस्तित्व चारों युगों में विद्यमान रहा है।मान्यता है कि यह मंदिर यंत्र-मंत्र का केन्द्र रहा होगा । रतनपुर में देवीसती का दाहिना स्कंध गिरा था। भग वान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था।इस कारण मां के दर्शन से ही कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह जागृत पीठ है,जहां भक्तों की समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं।
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