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: माँ दंतेश्वरी का मंदिर, शक्तिपीठ और नूपुर की आवाज......

Admin Thu, Jul 25, 2024

डंकिनी-शंखनी के तट पर बस्तर के दंतेवाड़ा में माँ दंतेश्वरी का मंदिर स्थापित है।यह 52 शक्तिपीठों में से एक है।दंतेवाड़ा का नाम इस देवी के नाम पर पड़ा था। पौराणिक कहानियों के अनुसार यह वही जगह है जहाँ देवी सती का दांत गिरा था! महाप्रतापी राजा अन्नमदेव आंध्रप्रदेश के वारंगल से अपने विजय अभियान पर निकले,रास्ते में पड़ने वाले सभी राज्यों को वे जीतते जा रहे थे, हर जीत का जश्न वे मां के पूजन से करते थे।राजा अन्नमदेव को माता दंतेश्वरी का ऐसा वरदान हासिल था कि हर जगह उनकी जीत होती थी। इतिहास की किताबों में दर्ज है कि कई राजा तो उनसे लड़े बिना हार स्वीकार लेते थे।मां की कृपा हर पल उनके साथ रहती थी। मां दंतेश्वरी का आशीर्वाद साथ लिये राजा अन्नमदेव विजय पताका फहराते हुए चले जा रहे थे। उनका लाव लश्कर बस्तर की ओर बढ चला था। हर दिन नये गढों पर कब्जा करते हुए बढते जा रहे थे।अन्नमदेव को माता दंतेश्वरी ने वरदान दिया था कि तुम आगे बढते रहो मैं तुम्हारे पीछे-पीछे हूं। माता ने यह भी कहा था कि जब तक तुम पीछे मुड कर नहीं देखोगे, तब तक मैं तुम्हारे साथ रहूंगी।मेरी मौजूदगी का अहसास मेरे पैरों के नुपूर, बिछुवे की आवाज तुम्हें कराती रहेगी फिर भी यदि तुमने पीछे मुड़ कर देखा तो समझो कि मैं चली.....! राजा अन्नमदेव लगातार विजय पथ पर बढते रहे, बढते रहे, माता के पैरों की नूपूर की ध्वनि पीछे से लगा तार आती रही,राजा का उत्साह दिन दूना रात चौगुना बढता जा रहा था। बस्तर पहुंचने पर शंखिनी- डंकिनी नदी के तट पर राजा अन्नमदेव के कानों में नूपूर की आवाज आनी अचानक बंद हो गई। वारांगल से सैकडों कोस दूर आने और पूरे बस्तर में अपना राज्य स्थापित करने तक महा प्रतापी राजा अन्न्मदेव के कानों में नुपूर की ध्वनि गूंजती रही थी। उनके कानों को जैसे उसकी आदत सी पड़ गयी थी,नूपूर ध्वनि के बंद हो जाने से अन्न्मदेव चौंक गये। हड़बड़ाहट और भविष्य में हार के भय की घबराहट तथा यह जानने की उत्सुकता कि ऐसा क्या हुआ कि मां के पैरों के नुपूर की आवाज आनी बंद हो गयी,अन्नम ने बिना कुछ सोचे-समझे पीछे मुड़ कर देखा और वरदान की बात याद ही नहीं रही। राजा ने पीछे देखा तो नदी तट पर दूर उनके सैनिक रेत उड़ाते आते दिखे,नदी तट पर बालू और रेत ही रेत थी,राजा ने सोचा, हो सकता है माता का पांव शंखिनी- डंकिनी नदी की रेत में फंस गया हो,इसी से आवाज न आयी हो,राजा नदी तट से आगे बढा पर जब उसे नुपूर की कोई आवाज न सुनायी दी तो उसने वहीं समूची सेना को रोक दिया।रात में अन्नम देव को माता ने साक्षात दर्शन दिये पर वह स्वप्न था, माता ने कहा ‘अन्नमदेव.., तुमने नियम तोड़ा, पीछे मुड कर देखा,अब मैं जाती हूं 'राजा अन्नम देव माता के चरणों में लोट गये,बोले- माता अब मैं युद्ध में विजय की कामना ले कर आगे ही नहीं जाऊंगा,पर आप मेरे साथ ही रहें। राजा के बहुत रोने धोने पर माता पसीज गयीं,वहीं अपना अंश स्थापित किया जबकि अन्नम देव ने यहीं विजय यात्रा समाप्त कर दी।डंकिनी- शंखनी के तट पर यहीं माँ दंतेश्वरी का मंदिर बना यह 52 शक्ति पीठों में से एक है।दंतेवाड़ा का नाम इस देवी के नाम पर पड़ा। (स्रोत: कथा इतिहास और किवदंतियां)

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