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: छत्तीसगढ़ का काशी, खरौद में है एक लाख लिंगों के उभार वाला शिवलिँग

Admin Sat, Aug 10, 2024

हिन्दूस्तान में शिव मंदिरों की भरमार है लेकिन कुछ शिवालय ऐसे हैं, जिनका इतिहास आज भी रहस्‍य मय है। ऐसा ही एक शिव मंदिर छग में स्थित है, शिव लिंग की खास बात यह है कि यह एक दो नहीं पूरे एक लाख लिंगों के उभार वाला है। मान्यता है कि यहां जो भी अपनी मनोकामना लेकर आता है उसकी मनोकामना पूरी होती ही है। सावन मास और महाशिवरात्रि पर्व के समय यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है। शिवलिंग से जुड़ा रहस्य... कहा जाता है कि इस शिवलिंग में अर्पित जल पाताल में चला जाता है।शिव मंदिर छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण मंदिर से 3 किलोमीटर दूर पर खरौद नामक स्थान पर स्थित है। खरौद छत्तीसगढ़ का प्रमुख कला केंद्र है और इस स्थान पर मोक्ष की प्राप्ति होती है इसे "छत्तीसगढ़ का काशी" भी कहा जाता है। मान्यता है कि श्रीराम ने राक्षस खर और दूषण का यहीं पर वध किया था। इसीलिए इस जगह का नाम खरौद पड़ा है।मान्यता है कि यहां पूजा करने से 'ब्रह्महत्या' के दोष का भी निवारण हो जाता है। पौराणिक कथा.... कहते हैं कि रावण का वध करने के बाद लक्ष्मणजी ने भगवान राम से इस मंदिर की स्थापना करवाई थी। यह भी कहते हैं लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के गर्भगृह में मौजूद शिवलिंग की स्था पना स्वयं लक्ष्मण ने की थी कथा के अनुसार शिवजी को जल अर्पित करने के लिए लक्ष्मणजी पवित्र स्थानों से जल लेने गए थे, एक बार जब वे आ रहे थे तब उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। तब शिवजी ने बीमार होने पर लक्ष्मण जी को सपने में दर्शन दिये और इस शिवलिंग की पूजा करने को कहा। पूजा करने से लक्ष्मणजी स्वस्थ हो गये तभी से इसका नाम लक्ष्मणे श्वर है। मंदिर के प्राचीन शिलालेख के अनुसार 8वीं शताब्दी में राजा खड्गदेव ने इस मंदिर के निर्माण में योगदान दिया था। यह भी उल्लेख है कि मंदिर का निर्माण पाण्डुवंश के संस्था पक इंद्रबल के पुत्र ईसान देव ने करवाया था। कहते हैं इसे लक्षलिंग यह मंदिर अपने आप में बेहद अद्भुत और आश्चर्यों से भरा है। कहते हैं कि इस शिवलिंग में एक लाख लिंगों के उभार है इसीलिए इसे लक्षलिंग या लखेश्वर कहा जाता है। इनके लगभग बीच में एक अक्षय छिद्र जैसा है जो पाताल से जुड़ा है ऐसी मान्यता है। इसमें जितना भी जल डाला जाता है वह सब पाताल में समा जाता है पर वह हमेशा जल से भरा रहता है जिसे अक्षय कुण्ड भी कहा जाता है। लक्षलिंग, जमीन से करीब 30 फीट ऊपर है और इसे स्वयंभू भी कहा जाता है।

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